नर्मदा के कटाव से प्रभावित होता कल्पवृक्ष, लोगों ने की संरक्षण मांग।

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तीन सौ वर्ष पुराना बताया जाता है कल्प वृक्ष

वृक्ष का आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व है

 डिंडोरी

 9 मई 2022

भूमिका भास्कर संवाददाता

अमन सिद्दीकी

डिंडौरी और अनूपपुर जिले की सीमा पर स्थित सिवनी संगम गांव में एक अति प्राचीन विशालकाय पेड़ है। जिसे स्थानीय लोग व वरिष्ठ वैज्ञानिक कल्पवृक्ष होने का दावा कर रहे हैं। नर्मदा और सिवनी नदी के संगम तट पर स्थित नजर आते इस अति प्राचीन विशालकाय पेड़ को कल्प वृक्ष मानकर न सिर्फ आसपास के गांवों के बल्कि दूर दूर से श्रद्धालु अपनी मन्नत लेकर यहां पहुँचते हैं और इस पेड़ की पूजा करते हैं। मान्यता है की पेड़ की पूजा करने से हर मनोकामना पूरी होती है।

स्थानीय लोग बताते हैं की मई के महीने में जब भीषण गर्मी पड़ती है तब यह वृक्ष हरा भरा हो जाता है और इसमें फल भी लगते हैं। जिले के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर ओ पी दुबे का दावा है की यह कल्पवृक्ष ही और इस पेड़ का धार्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व भी है। औषधीय गुणों से भरपूर इस पेड़ की पत्तियां, फल,छाल एवं जड़ों से तरह तरह की गंभीर बीमारियां दूर हो जाती हैं। वहीं इस पेड़ का विशेष धार्मिक महत्व भी है। परिक्रमा करने वाले अधिकांश श्रद्धालु इस कल्प वृक्ष के दर्शन करते है एवं यहां साधना का विशेष महत्व बताया जाता है।

वैज्ञानिक दृष्टि से महत्व :

एक तरफ जहां ये वृक्ष अपने औषधीय गुणों की वजह से जाना जाता है वहीं ये पर्यावरण के लिहाज से भी काफी लाभदायक है। ऐसा कहा जाता है की जहां यह वृक्ष पाया जाता है उस इलाके में कभी सूखा नहीं पड़ता। वरिष्ठ वैज्ञानिक दुबे ने बताया की कल्पवृक्ष का वानस्पतिक नाम ओलिया कुसपीडाटा है। यह ओलिसी कुल का पौधा है। इस वृक्ष के एक स्पेसिज ओलिया यूरोपिया के फलों के बीजों से तेल निकाला जाता है जो हृदय रोगियों के लिए लाभकारी होता है। इसमें संतरे से 6 गुना ज्यादा विटामिन ‘सी’ होता है। गाय के दूध से दोगुना कैल्शियम होता है और इसके अलावा सभी तरह के विटामिन पाए जाते हैं।

कल्पवृक्ष मिट्टी के कटाव से प्रभावित:

नदी के कटाव के कारण इस विशालकाय वृक्ष की जड़ें बाहर निकल आई है जड़ों के आधे हिस्से में करीब 12 फ़ीट गड्ढा बन गया है। स्थानीय लोग एवं वैज्ञानिक के दावों में कितनी सच्चाई है यह कहना मुश्किल है पर अगर यह पेड़ सच में कल्प वृक्ष है तो तत्काल इसको संरक्षित करते हुए कटाव को भरना चाहिए तभी इस खास धरोहर को समाप्त होने से बचाया जा सकता है।

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