क्या होगा सुखधाम में?
ध्यान साधना के लिए सुखधाम के रूप में सत्य शांति व शक्ति का केंद्र स्थापित होगा रत्नपुरी में
रतलाम/बड़ावदा-शिरीष सकलेचा
आज के इस आपाधापी के जीवन में मनुष्य एकांत व शांति खोता जा रहा है ।अतः उसे अपने मन को एकाग्र करने के लिए ध्यान साधना करना बेहद जरूरी हो गया है। जिससे उसका भटका हुआ मन स्थिर रह सकता है क्योंकि ध्यान साधना के बाद मनुष्य का मन शांत हो जाता है। यूं तो रतलाम की धरा पर साधना विपश्यना का कार्य शनै शनै वर्षों से चल रहा है इसी सिलसिले में स्वर्गीय डॉक्टर एन के वाधवानी और उनकी टीम के उल्लेखनीय कार्य के पश्चात गत वर्ष सेठिया मैरिज गार्डन पर 11 दिवसीय सत्य साधना शिविर का आयोजन श्री पूज्य जिन चंद्र सूरी जी महाराज साहब के सानिध्य में संपन्न होने के पश्चात ध्यान साधना का रतलाम में नए वातावरण का निर्माण हुआ और अब मुंबई के श्री वल्लभ भंसाली ने रतलाम को स्थाई सौगात सुखदाम के रूप में देकर सत्य शांति व शक्ति का केंद्र बनाने का खाका तैयार कर रतलाम के नागरिकों के सम्मुख एक परिचर्चा के माध्यम से प्रस्तुत किया जिसमें विधायक चैतन्य कश्यप की अगुवाई में नागरिकों ने अपनी सहमति की मोहर लगा दी इस दौरान योगाचार्य एवं एक्यूपंचर विशेषज्ञ राजीव श्रीवास्तव ने सुखधाम मैं बालक को के लिए ध्यान की विशेष व्यवस्था रखने पर जोर दिया ताकि नौनिहालों का रुझान इस और हो सके अन्य नागरिकों जिज्ञासाओं को भी भंसाली ने शांत किया ।
बाजना रोड स्थित पर्यावरण पार्क के सामने सत्य विज्ञान फाउण्डेशन मुम्बई द्वारा सत्य, शांति व शक्ति के केन्द्र के रूप में ‘सुख-धाम’ की स्थापना की जाएगी। ‘सुख-धाम’ की परिकल्पना को साकार करने के लिए सैलाना रोड स्थित श्रीजी पैलेस में फाउण्डेशन द्वारा परिचर्चा आयोजित की गई।सत्य विज्ञान फाउण्डेशनमुम्बई के फाउण्डर मुख्य वक्ता वल्लभ भंसाली ने कहा कि अंधेरे को भेदने के लिए एकाग्रता जरूरी है। भीतर जाने का कार्य ही सत्य है। उसी में शांति है और यही शक्ति पूंज है, जिसे ‘सुख-धाम’ सार्थक करेगा। जिस प्रकार एक अच्छी तस्वीर के लिए कैमरे पर कैमरामेन के हाथ स्थिर रखना जरूरी होते है, उसी प्रकार खुद पर नियंत्रण के लिए स्थिरता जरूरी है। यह स्थिरता ही एकाग्रता है। मनुष्य को सदैव महसूस होता है कि उसके पास कोई न कोई अभाव है और इस अभाव की पूर्ति के लिए वह कुछ न कुछ करता रहता है। फिर भी अभाव की पूर्ति नहीं हो पाती है। एकाग्रता वह रामबाण है, जिससे सारे अभावों को पूर्ण किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि प्रकृति ने हमे जो दिया है, हमारे मन में उससे सवाया उसे देने की प्रवृत्ति होनी चाहिए, लेकिन मनुष्य प्रकृति की सौगातों को अपना समझता है और उनका दोहन करता रहता है। इस प्रवृत्ति को बदलना होगा और प्रकृति को अपना न समझते हुए उससे मिलने वाले अंश से अधिक लौटाने की मनोवृत्ति विकसित करनी पड़ेगी। भंसाली ने कहा कि जितना सुख लेने में नहीं मिलता उतना देने में होता है। ‘सुख-धाम’ की परिकल्पना इसी उददेश्य को पूरा करने के लिए की गई है।
“मुम्बई में बैठा व्यक्ति यहां के लोग कैसे सुखी हो, इसकी कल्पना कर रहा” यह सौभाग्य की बात है।
विशेष अतिथि भाषाविद् एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. जयकुमार जलज ने कहा कि रतलाम का सौभाग्य है कि मुम्बई में बैठा व्यक्ति यहां के लोग कैसे सुखी हो, इसकी कल्पना कर रहा है। सुख का चिंतन व्यक्ति घर पर भी कर सकता है, लेकिन दूसरों के लिए करने की भावना मानवीय इच्छा है और यही व्यक्ति को सबसे से अलग बनाती है। उन्होंने रतलाम के विकास में विधायक चेतन्य काश्यप के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके प्रयासों से शहर ही नहीं, शहरवासियों का सर्वांगीण विकास हो रहा है।
‘सुख-धाम’ की कल्पना एक लम्बी प्रक्रिया का हिस्सा
परिचर्चा की अध्यक्षता करते हुए विधायक चैतन्य काश्यप ने कहा कि रतलाम की जनता सर्वग्राही एवं सर्वस्पर्शी हैं। वर्तमान में सर्वत्र एकाग्रता देने वाले ‘सुख-धाम’ की जरूरत है।‘सुख-धाम’ की कल्पना एक लम्बी प्रक्रिया का हिस्सा है। खुद के भीतर जाने की प्रक्रिया व्यक्ति कही भी कर सकता है, लेकिन इसके लिए स्थापत्य की अपनी महत्ता है। हमारी संस्कृति में यम, नियम एवं आसन आदि का विशिष्ट महत्व है। इनके आचरण से व्यक्ति अति चेतन्यता की स्थिति को प्राप्त कर सकता है। सामान्यतः यह प्रयोग जीवनशैली बदलने के काम आते है, जो वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अतिप्रासंगिक हो गए है। उन्होंने कहा कि मनुष्य का मूल स्वभाव सामुहिकता है। घर पर भी ये कार्य हो सकता है, लेकिन स्थापत्य होगा, तो उसका सुकून अलग मिलेगा। काश्यप ने ‘सुख-धाम’ की स्थापना के कार्य में पूरा सहयोग देने की घोषणा की।
*तत्कालीन एसपी भी* *हुए थे प्रभावित*
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पिछले कुछ माह पूर्व रतलाम के सेठिया मैरिज गार्डन में सत्य साधना का 10 दिवसीय शिविर आयोजित किया गया था जिसमें रतलाम के तत्कालीन एसपी गौरव तिवारी भी सहभागी बने थे। कार्यक्रम के दौरान उन्होंने स्वयं में एक बार इस तरह के शिविर को करने की मंशा जाहिर की थी।
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