हर्ष प्रिया जी ने खुश रहने के दिए तीन मंत्र ।
हर परिस्थिति को स्वीकार कर जीवन जीने वाला कभी दुखी नही होता–हर्ष प्रिया श्री जी
जीवन निर्माण की कला विषय पर हुए विशेष प्रवचन
बड़ावदा। शिरीष सकलेचा
यदि व्यक्ति चिंता से मुक्त होकर , अपनी सोच में सुधार लाकर , हर परिस्थिति को स्वीकार करते हुए सकारत्मकता जे साथ जीवन जिना सीख जाय तो वह कभी दुःखी नही हो सकता है बल्कि खुशियालीभरा जीवन जीकर अपने घर परिवार को स्वर्ग बना सकता है। चिंता चिता का कारण बनती है। इससे मुक्त होकर जीवन जीने वाला हर हाल में मस्त रह सकता है।
ये बाते रविवार को माहेश्वरी धर्मशाला में जैन साध्वी *हर्ष प्रिया* श्री जी ने कही। वे यहाँ मुंदड़ा परिवार द्वारा आयोजित *जीवन* *निर्माण की कला* विषय पर विशेष प्रवचन देते हुए बोल रही थी। मुक्ति प्रिया श्री जी के मंगलाचरण से धर्म सभा की शुरुआत हुई। अर्हम प्रिया श्री जी ने कहा कि परमात्मा के मंदिर में जब भी जाओ पुजारी बन कर जाना भिखारी बनकर मत जाना। परमात्मा से सच्ची प्रीत जोड़ो।
हर्ष प्रिया श्री जी ने कहा कि व्यक्ति जीवन कैसा जीना चाहता है यह उसके हाथ में है। देखा जा रहा है कि व्यक्ति वर्तमान की बजाय भविष्य की चिंता में डूब कर अपने आप को दुखी कर रहा है वह अपनी सोच में कभी सुधार नहीं लाना चाहता है इसलिए यदि हम अच्छा जीवन जीना चाहते हैं तो चिंताओं के त्याग कर हमें हर परिस्थिति को स्वीकार करते हुए जीना होगा जीवन में हमेशा सुख और दुख दोनों आते हैं लेकिन जो परिस्थितियों के साथ समझौता कर ले वही प्रसन्न रह सकता है व्यक्ति परिस्थिति को तो नहीं बदल सकता है लेकिन मन स्थिति को बदलना उसके हाथ में है। दूसरों को बदलने की बजाय हम खुद अपने आप को बदलने का प्रयास करें। आपने कहा कि नदी व नाले दोनों से पानी बहता है लेकिन व्यक्ति नदी के पानी को पसंद करता है क्योंकि नदी के पानी में निर्मलता होती है जबकि नाले के पानी में मलिनता होती है। अतः हम अपना आचरण नदी जैसा बनाये ताकि सभी हमे पसंद करे। चातुर्मास समिति सचिव शिरीष सकलेचा ने बताया कि इस अवसर पर वाली(राजस्थान)के शांतिलाल मेहता, आयोजन के लाभार्थी भगवन्ता बाई मुंदड़ा व परिवार का जैन श्री संघ द्वारा बहुमान किया गया। महाआरती उतारी गयी।संचालन मनोहर तोषनीवाल ने किया व आभार राजेन्द्र मुंदड़ा ने माना।
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