कविता जरूर पढ़िए : राम सिया वनवास चले हैं।

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भूमिका भास्कर प्रतिनिधि जयदेव विश्वकर्मा 9584995363 की रिपोर्ट

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राम सिया वनवास चले हैं..
दृढ़ हो कर्तव्य निभाने को,
पीछे पीछे प्रजा चली है..
नृप-राज्ञी को लौटाने को,
दशरथ जी को पता कहां था..
वचन ऐसा रूप दिखाएगा,
वो भी अब विवश हो चले हैं..
खुद से दिए वचन निभाने को |

परिस्थिति ऐसी आन पड़ी है..
प्रकृति भी आज रोती है,
कौशल्या मां विलाप करती हैं..
प्रजा भी अश्रु बहाती है,
अपने नृप के बिना तो..
हमारा जीवन व्यर्थ हो जाएगा,
प्रजा बस शोक मनाती है..
एवं यही बात दोहराती है |

राम प्रभु दीक्षा देते हुये..
पितृ ऋण को महान बताते हैं,
त्याग नियम है सृष्टि का..
पुत्ररूपी प्रजा को समझाते हैं,
सुख-दुख वचन त्याग कर्तव्य..
यह सब तो आधार जीवन के,
कम शब्दों में मेरे प्रभु राम..
विशाल बात कह जाते हैं |

लेखक : वांछा शुक्ला
शहडोल ( म. प्र. )

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