चरणवंदना की पत्रकारिता..।
आशीष कुमार जैन ( 7354469594)
( लेखक भूमिका भास्कर समाचार पत्र समूह के संपादक एवं देश की कई प्रसिद्ध सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं)
सागर – इंडियन एक्सप्रेस समूह के मालिक रामनाथ गोयनका से जुड़ा एक चर्चित किस्सा है. एक बार किसी समारोह के दौरान उस वक्त के केंद्रीय मंत्री ने गोयनका से मुलाकात की. उनके साथ एक्स्प्रेस के एक रिपोर्टर भी थे. मंत्री ने उस रिपोर्टर की पीठ पर धौल जमाते हुए गोयनका से कहा – आपका रिपोर्टर बढ़िया काम कर रहा है. गोयनका ने उस वक्त तो कोई प्रतिक्रिया नहीं दी लेकिन दूसरे ही दिन उस रिपोर्टर को अलविदा कह दिया.
संदेश साफ था कि सत्ताधारी को तो प्रेस से बीट रिपोर्टर से तकलीफ होना चाहिए, जान सासंत में बनी रहे. तभी तो माना जाएगा कि पत्रकारिता जिंदा है. मंत्री यह कहता कि इन महाशय ने तो हमारा जीना मुहाल कर रखा है, जरा इन्हें रोकिये तो शायद गोयनका के तेवर कुछ और होते. एक अच्छा मालिक और संपादक अपेक्षा भी यही करता है कि उसका रिपोर्टर सत्ता का तमूरा न बजाय बल्कि उसकी बैंड बजा दे. हर हाल में जनता के साथ खड़ा हो.
आज पत्रकारिता में दुर्भाग्य से विरोध में लिखना तो दूर सीधे राजनेताओं की चरणवंदना का काम शुरू हो गया है. वो भी ऐसे नेताओं की जिनकी रीढ़ ही नहीं है. मैं जब ऐसे दृश्य देखता हूं या सुनता हूं तो शर्मिंदा हो जाता हूं. हद तो तब और ही हो जाती है जब पैर छूने के दौरान राजनेता उन पत्रकारों को अनदेखा तक कर देते हैं. लेकिन इसके बावजूद पैर पराई जारी है. पत्रकारिता का यह पतन विचलित कर देता है और आहत भी.. विनती है कि थोड़ा- बहुत ही सही अपना जमीर बचा कर रखिये।
